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वर्ष: 3, अंक 49, नवम्बर(द्वितीय) , 2018



गाँव - गाँव हो गया भिखारी


डॉ डी एम मिश्र


                   
गाँव - गाँव हो गया भिखारी
ये कैसी माया     सरकारी

विधवा बनकर पेन्शन लेती        
देखा एक सुहागन नारी

वोट के बदले नोट मिलेगा
खुला ख़ज़ाना है सरकारी

स्वाइन -फ्लू आ गया यहाँ  भी
सूअर बाँट रहे बीमारी

हाड़ के पीछे  कुत्ते लड़ते
बीच सड़क पर मारा - मारी

महाकुम्भ के इस मेले में
बुढ़िया गिरी पिसी बेचारी

मोदी हों या राहुल भैया
देश से ज़्यादा कुर्सी प्यारी

कुछ कवि जनता का दुख गाते
कुछ गाते कविता दरबारी 

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