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वर्ष: 3, अंक 49, नवम्बर(द्वितीय) , 2018



प्रेम सागर के दोहे


प्रेम सागर


                         
जो बड़ेन खुद ना कहे,जानत बड़े न कोय ।
बिन नैनन पट खोलि कै,आँखन कौ दुति होय ॥ १

रात्रि दिवस  पूजन करे, ईश ब्रह्म  की बात ।
हृदय प्रेम उपजे नहीं, करे हृदय पर घात ॥ २

लोहा पर शीशा  गिरै, शीशा चकनाचूर ।
अहं प्रेम समुझै नहीं, भावहिं कोसो दूर ॥ ३

पोथी पढ़ि भगवान कौ, शबद -शबद कौ ज्ञान।
पाखण्डी शिव नाम लै, शंकर सो अनजान ॥ ४

बाहर दीया बारि कै, अन्दर की दुति खोय ।
बाहर उजियारा करै, अन्दर जो दुति होय॥ ५

ज्ञानी को समुझे कहाँ, अज्ञानी संसार ।
अज्ञानी इस पार हौं, ज्ञानी हौं उस पार ॥ ६

प्रेम कहाँ मैं से रहे, प्रेम रहे तो मैं न ।
जो मैं मैं की रट करै, वाकौ प्रेम बचै न ॥ ७

प्रेम नहिं कछु लेइ सकै, प्रेम करै बस दान ।
दे-देकर जग जीत लै, ऐसो यह वरदान ॥ ८

नारी मन को जानि लै, ऐसो जग में कौन ।
कैसो सुर-लय की कहौ, साज जहाँ हो मौन।।  ९

पण्डित वेद पुराण कौ , मुल्ला पढ़ै कुरान । 
पण्डित ना भगवान हौं, मुल्ला ना ईमान।। १०
 
पण्डित मुल्ला मन बसै, स्वर्ग-लोक की चाह।  
ईश्वर अल्ला की कहाँ, कोउ करे परवाह ।। ११
 
संतन मुनि को मान दै, मानै शंकर बुद्ध । 
जानै पर नहिं  सत्य जो, करै चेतना शुद्ध ।। १२  

पहिरे धन-लिप्सा करै, चाहे फिर सुख-चैन । 
जैसे खोजे चाँदनी, बंद रखे पर नैन ।। १३ 

सूखा कूआँ बालटी, गिरै करै फिर शोर । 
ज्ञान बिना जब मुंह खुले, मुंह होवै मुंहजोर।। १४ 

जो खोजै  भगवान को, पा न सकै  इंसान ।
जौ लौं अंतर झाँकि लै, पड़ा मिलै भगवान ।। १५
 
सोवत है जो खो दिया, जागत है सो पाय । 
खुले आँख सूरज मिलै, बंद आँख कजराय ।। १६ 

देह-देह की भूख में, आतम-भूख बिलाय । 
सम्मुख प्रभु को छोड़ ज्यों, जड़-मूरत अपनाय ।।  १७ 

माटी मूरत पूजि कै, समुझै आपहि भक्त ।
सत् चित अक्षर छोड़ि कै, मिट्टी में आसक्त ।।  १८
 
नेम धरम पूजा करौं, तिलक लगावहिं भाल।
अक्षर को नहीं पावहिं, भेंटैं काल कराल।।  १९ 

बतरस आतम-ज्ञान का, जड़ से मन हरसाय ।
हरि हरि बस जीह्वा करे, माया हृदय बसाय ।।  २० 
  

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