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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



मोगरा


आचार्य संजीव वर्मा सलिल


खिला मोगरा जब-जब, तब-तब याद किसी की आई। महक उठा मन श्वास-श्वास में गूँज उठी शहनाई। * हरी-भरी कोमल पंखुड़ियाँ आशा-डाल लचीली। मादक चितवन कली-कली की ज्यों घर आई नवेली। माँ के आँचल सी सुगंध ने दी ममता-परछाई। खिला मोगरा जब-जब, तब-तब याद किसी की आई। * ननदी तितली ताने मारे छेड़ें भँवरे देवर। भौजी के अधरों पर सोहें मुस्कानों के जेवर। ससुर गगन ने विहँस बहू की की है मुँह दिखलाई। खिला मोगरा जब-जब, तब-तब याद किसी की आई। * सजन पवन जब अंग लगा तो बिसरा मैका-अँगना। द्वैत मिटा, अद्वैत वर लिया खनके पायल-कँगना। घर-उपवन में स्वर्ग बसाकर कली न फूल समाई। खिला मोगरा जब-जब, मुझको याद किसी की आई। - संजीव वर्मा सलिल
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