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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



पराये दुःख

मधु संधु


परायों के दिए दुखों की आवाज होती है अपनों के दिए दुख बेआवाज ही रहते हैं। काश! दुख आंधी-तूफान होते आते और चले जाते काश! दुख बाढ़ या सूखा होते। दुख जो न दिखते हैं न दिखाने का कोई अर्थ होता है जंगल की आग की तरह कैंसर की तरह सब राख में परिणत कर देते हैं। बेआवाज दुख घुटे -घुटे दुख जिन्हें न परिचित -पड़ोसी देते हैं न गुंडे-बदमाश न व्यवस्था -अव्यवस्था न सामाजिक -सरकारी नीतियां न मूल्यवत्ता या अवमूल्यन । दुख जो घुलते नहीं पालथी मार बैठ जाते है मन के इस कोने से उस कोने तक। दुख जो निर्णय की शक्ति छीन लेते हैं पीस देते हैं कतरा-कतरा जिनकी अंधेरी, बीहड़, यातनामय, कारावास का कोई रास्ता रोशनी में नहीं खुलता।
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