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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



वो बात मुझे घर कर गयी

अमिताभ विक्रम


वो बात मुझे घर कर गयी, तेरी दवा मुझे असर कर गयी। जब ज़िंदा रहना लाज़मी ना रहा, वो जां को ज़िस्म से जुदा कर गयी। कहा था इश्क़ आग है इससे ना तू खेल, तन हुआ ख़ाक रूह भी हवा हो गयी। अपने जज़्बातों को कागज़ पै ना उकेर, अश्कों के सैलाब में वो कश्तियाँ बह गयी। नर्म बिस्तरों सी नींद खरीदी नहीं जाती, आँखें खोल ढूंढते हो वो कहाँ खो गयी।
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