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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

बालगीत संग्रह "मेरे प्रिय बालगीत" का विमोचन

बाल साहित्य लेखन में बालमन की आवश्यकता - डॉ प्रभात त्रिपाठी

रायगढ़- शहर के स्थानीय होटल में ख्यातिलब्ध बाल साहित्यकार शंभूलाल शर्मा'वसंत' का बहुप्रतीक्षित बालगीत संग्रह "मेरे प्रिय बालगीत" का विमोचन साहित्य अकादमी से पुरस्कृत डॉ प्रभात त्रिपाठी के मुख्य आतिथ्य व करकमलों से छत्तीसगढ़ महतारी व माँ सरस्वती की पूजन अर्चन कर आरम्भ किया गया।वही कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय कवि संगम के जिलाध्यक्ष अंजनी कुमार 'अंकुर' जी ने किया।विशिष्ट अतिथि कृषि वैज्ञानिक,सम्पादक व संरक्षक डॉ विनोद कुमार वर्मा,वरिष्ठ साहित्यकार केवलकृष्ण पाठक ,कलागुरु वेदमणि सिंह ठाकुर,शिक्षाविद प्रो.के.के. तिवारी,संरक्षक छत्तीसगढ़ महतारी संस्कृति संवर्धन सेवा समिति के हरिश्चंद्र निषाद ,वरिष्ठ साहित्यकार गोपीनाथ बेहरा,वरिष्ठ साहित्यकार विजय राठौर रहें। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ प्रभात त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य में शुभकामनाएं देते हुए वसन्त जी के कुछ चुनिंदा कविताओं की प्रशंसा कर बाल साहित्य लेखन शैली को अनूठा व रोचक बताया। बाल साहित्यकार कितनी मर्मता के साथ उन गहराई में डूबकर अनुभव कर बाल कविता का रूप देता है।तब जाकर एक कविता बनती हैं। बाल कवि बालमन होकर सुकोमल जिज्ञासाओं को शांत करता है और उसे कल्पना के पंखों के सहारे उड़ना सिखाता है कभी तारों से बात करते हैं तो कभी उड़न खटोला में उड़ने लगते है तो कभी कैप्टन हाथी राजा बन जाता हैं।बिना अच्छा बाल साहित्य लिखे, कोई लेखक अपने में पूर्ण नहीं हो सकता।बच्चे कल के भविष्य होते हैं। और बाल साहित्य बच्चे के मन को रंजित करते हुए, उसके सर्वांगीण विकास की आधार-भूमि तैयार करता है।बाल साहित्य खेल-खेल में उसे आसपास की दुनिया से परिचित कराता है।डॉ विनोद कुमार वर्मा ने उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर गहरा प्रकाश डालते हुए शुभकामनाएं प्रेषित किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा की बाल कवि के सामने तो बस बालक का प्रत्यक्ष चेहरा होता है। जिस तक वह स्वतः अपने मन की भावनाएं सम्प्रेषित करना चाहता है। वह एक गहरी डुबकी लगाकर अपने बचपन में उतरता है तो उसकी भाषा, संवेदना और अभिव्यक्ति खुद-ब-खुद ऐसी चपल-चंचल हो जाती है, जो हर बच्चे को आकर्षित करे, और खेल-खेल में जीवन की बड़ी से बड़ी बातों को बच्चे के जिज्ञासु मन तक पहुंचा दे।वही कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अंजनी कुमार 'अंकुर' अपने उदबोधन में कहा वसन्त की जितनी तारीफ किया जाए बहुत कम है।मुझ अकिंचन को छत्तीसगढ़ी कविता लेखन के लिए अपना प्रेरणास्रोत मानना मेरा परम सौभाग्य से कम नही।जब इनके साहित्य लेखन का आंकलन होगा तब इनके साहित्य अवदान पद्मश्री सम्मान के हकदार है। वही प्रो कान्ति कुमार तिवारी ने भगवान श्री कृष्ण की बाललीलाओं का उदाहरण दे वसन्त जी के कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए काव्य पंक्तियो से अपनी बात रखीं।इसी क्रम में केवलकृष्ण पाठक ने बधाई देते बाल साहित्य पर उनके अनूँठे योगदान को सराहा।कलागुरु वेदमणि सिंह ठाकुर ने अपनी गजलों से गुनगुना कर भूरी -भूरी प्रशंसा की।वरिष्ठ साहित्यकार गोपीनाथ बेहरा जी ने भी बाल साहित्य के चितेरे शर्मा जी को कोटिशः शुभकामनाएं प्रेषित किये।विजय राठौर ने कहा कि अच्छा बाल साहित्य बच्चे की संवेदना का विस्तार करता है, उसे अधिक समझदार और जिम्मेदार बनाता है और उसमें सकारात्मक संवाद की क्षमता विकसित करता है। शंभुलाल शर्मा'वसन्त' ने अपने लेखकीय उदबोधन में सभी का आभार प्रकट कर धन्यवाद ज्ञापित किया तथा शताक्षी प्रकाशन ,रायपुर के अथक प्रयास की भी सराहना की।जिन्होंने मेरी बालगीत संग्रह को मूर्त रूप देकर पठनीय बनाया।अपनी प्रतिनिधि कविता रोना आया, कैप्टन हाथी , सपने में तथा एक छत्तीसगढ़ी शिशु गीत आदि अभिनय व वाक शैली से सुना सराबोर किये। उक्त कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार मनहरण सिंह ठाकुर,प्रदीप उपाध्याय, नन्दलाल त्रिपाठी, गणेश कछवाहा, बयार अखबार प्रमुख सुभाष त्रिपाठी, साहित्य अभियान पत्रिका व बाल साहित्यकार संपादक सनत ने आज के दौर में बाल साहित्य की चुनौतियां और संभावनाएं क्या-क्या होनी चाहिये इस पर प्रकाश डाला। जैसे कि बाल साहित्य की सबसे बड़ी चुनौती है सुदूर गांव के बच्चों, गरीब सर्वहारा परिवारों के बालकों और आदिवासी बालकों तक पहुंचकर, उनके अंदर जीवन का हर्ष-उल्लास, आत्मविश्वास और कुछ करने की धुन पैदा करना, ताकि आगे आकर वे भी अपने जीवन के अधूरे सपनों को पूरा करें।आज हिंदी का बाल साहित्य उन असंभव लगती ऊंचाइयों से गुजरती हो परन्तु आज अच्छा बाल साहित्य बच्चों तक नहीं पहुंच रहा है।इस काम में बच्चों के माता-पिता और अध्यापकों की बड़ी भूमिका हो सकती है। अगर वे स्वंय इसका संवाहक बन अच्छा बाल साहित्य पढ़ें और उसे बच्चों के लिए उपलब्ध कराएँ तो बहुत कुछ बदल सकता है।नयी पीढ़ी आवाज के सम्पादक भानुप्रताप मिश्रा,हेमन्त चावड़ा,गीतकार शुकदेव पटनायक , मनमोहन सिंह ठाकुर, हरप्रसाद ढेंढे, गुलाब सिंह कंवर,आशा मेहर ,कमलेश पाठक ,मिलन मलरिहा,बसन्त साव,प्रमोद सोनवानी, रामरतन मिश्रा,जयंत पटेल,पत्रकार लक्ष्मी नारायण लहरे,सुनील एक्सरे , दिनेश रोहित चतुर्वेदी,सोनू बरेठ,ओमप्रकाश शर्मा आदि ने विमोचित पुस्तक हेतु काव्य पाठ व दो -दो शब्द बोल कर शुभकामनाएं प्रेषित किये। वही कोरबा से आई सुप्रसिद्ध लोक गायिका व संगीत शिक्षिका ने शंभूलाल शर्मा 'वसन्त' द्वारा रचित छत्तीसगढ़ महतारी की महिमा को बखान करती गीत की मनमोहक प्रस्तुति दी ।साथ में अरपा पैरी की धार सुंदर गीत की प्रस्तुति सभी के अन्तस को हिलोर गया।छत्तीसगढ़ साहित्य परिवार की ओर से सुश्री कामिनी निषाद को प्रतीक चिन्ह,शाल,श्रीफलव सम्मान राशि से सम्मानित भी किया गया।सफल मंच संचालन व संयोजन आनन्द सिंघनपुरी ने किया।सिंघनपुरी ने शर्मा जी के साहित्यिक योगदान की चर्चा की।हिंदी साहित्य परंपरा में बाल साहित्य की अपनी एक महत्वपूर्ण उपस्थिति कैसे दर्ज हो।

बाल साहित्य और बच्चों में साहित्य की अभिरुचियां कैसे बढ़ें, इस पर बाल साहित्यकार शंभूलाल शर्मा का अनूठा व सर्वोपरि योगदान बताया ।अंत में आशा मेहर जी ने भावपरक कविता सुना सभी साहित्य पुराधाओं,विद्वतजनों, पत्रकारों जिनका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से योगदान रहा ।सभी का हृदयतल से आभार प्रकट कर धन्यवाद ज्ञापित की।


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