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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

खजूर में अटकते हैं

अजय प्रसाद

आसमां से गिर हम कर खजूर में अटकते हैं शायद लोगों की नज़रों में बेहद खटकते हैं । मंज़िलों से तो रहती है अक़्सर गुरेज़ मुझको बस बेखौफ आवारा सडकों पर भटकते हैं । सदीयों से समस्याओं का है समाधान कहाँ आज भी न जाने कितने अधर में लटकते हैं । और क्या खून के आंसू तुम रुलाओगे भला देख जहां की बिसंगतियाँ रोज़ ही गटकते हैं । ले आ गया अजय आज तेरे दर पर अल्लाह क्यों न आज तेरे चौखट पे भी सर पटकते हैं ।

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