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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

देखिए जिसे वो गज़ल लिख रहा है

अजय प्रसाद

देखिए जिसे वो गज़ल लिख रहा है आए न आए मुसलसल लिख रहा है। मै,तुम,ये ,वो ,सब के सब ,हर बात पे हर हालात पे आजकल लिख रहा है । कोई बहर में है लिखता,कोई बे-बहर कोई खुद से तो,कोई नकल लिख रहा है । कोई कहता मुहब्बत को ज़रखेज ज़मीं तो कोई खुबसूरत दलदल लिख रहा है । किसी को लगतीं हैं वो आँखें झील सी कोई उनके चेह्रे को कंवल लिख रहा है । कोई खुश है किसी की यादों के साथ कोई मिलने के लिए बेकल लिख रहा है । कोई बेवफ़ा,संगदील,हरजाई,सितमगर कोई उन्हें ज़िंदा ताजमहल लिख रहा है । लोग मसगूल हैं मुस्तकबिल बनाने में वक्त चेह्रे पे हिसाब हरपल लिख रहा है । तू क्यों परेशां हैं खुद से अजय अब तक क्या तू खामोशी को हलचल लिख रहा है ।

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