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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

प्रगतिशील भारत में संस्कारविहीन शिक्षा

अंकित भोई 'अद्वितीय'

दिनोदिन हमारा देश शिक्षा एवं तकनीक के क्षेत्र प्रगति के नए आयाम स्थापित करते जा रहा है। देश के कई प्रतिभाएं विदेशों में भी सफलता के झण्डे गाड़ रहे हैं। भारतीय शिक्षा प्रणाली में हो रहे आमल चूल परिवर्तनों के कारण अब सरकारी व गैर सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी भाषा को प्राथमिकता दी जा रही है या यूं कहें कि शनै: शनै: शिक्षा का पाश्चात्यीकरण होता जा रहा है। भारतीय शिक्षा प्रणाली में हो रहे परिवर्तन के फलस्वरूप संस्कारहीनता, उच्छश्रृंखलता और अनुशासनहीनता दिन दूनी रात चौगुनी दर से बढ़ती जा रही है। किशोरों एवं युवाओं में नैतिक गुणों का पतन होते जा रहा है। सबसे अधिक विचारणीय विषय यह है कि क्या माता पिता अपने बच्चों को नैतिक शिक्षा दे पाने में समर्थ हैं? क्या अभिभावक अपने पाल्यों को अश्लील सामाग्रियों से दूर रख पा रहे हैं। क्या वे अपने बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान रख पा रहे हैं। यह एक निर्विवाद यथार्थ है कि समाज में बढ़ रहे अपराधों के लिए संस्कारहीन शिक्षा ही बुनियादी तौर पर जिम्मेदार है।

भारत में परिवार को ही प्रथम पाठशाला माना जाता है। शिक्षा और संस्कार का प्रारंभ परिवार से ही होता है। हमारे देश में मां को ही प्रथम गुरू माना जाता है। वर्तमान तेज रफ्तार व दौड़ भाग वाले गलाकाट प्रतिस्पर्धी जीवन में शायद माता-पिता, बच्चों के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन में करने में असफल सिद्ध हो रहे हैं। भारतीय समाज में ऐसी मानसिकता बन गई है कि केवल बेटियों को ही आचरण, व्यवहार, सही-गलत में भेद करना व कपड़े पहनने के ढंग बताने की आवश्यकता महसूस की जाती है। आज अभिभावक मोटे फीस देकर अपने बच्चों का दाखिला अच्छे स्कूल कालेजों में तो करवा देते हैं लेकिन वहां बच्चों की गतिविधियां कैसी हैं, बच्चों की संगति कैसी है, वे कहां जा रहे हैं ये सब जानने के लिए अभिभावकों को फुुर्सत नही हैं।

आज देश का युवा वर्ग अन्तः प्रतिस्पर्धात्मक संक्रमण काल से गुजर रहा है। विद्यालय व महाविद्यालय में पढ़ाई जाने वाली पाठ्य पुस्तकों में नैतिक शिक्षा का एक भी पाठ नहीं है। युवाओं के मन की बात जानने वाला, उनसे बातें करने वाला कोई नही हैं, या यूँ कहा जाए कि युवाओं की मनोदशा बीमार पड़ गई हैं। किसी भी राष्ट्र के युवा ही वहां के भावी कर्णधार होते हैं ऐसे में उनका शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होना कितना जरूरी हैं, यह तो सर्वभिज्ञ है। समाज के बुद्धिजीवियों का यह नैतिक दायित्व है कि ऐसी व्यवस्था का निर्माण करें जिससे युवा वर्ग समाजहित व देशहित के लिए प्रेरित हो सके। क्योंकि "हम बदलेंगे युग बदलेगा।"


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