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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

जन्मों तक तुम्हारा

शुचि 'भवि'

आज सुबह से ही अनमनी सी थी शम्पा,ख़ुद भी नहीं जानती थी शायद कारण।बार बार अपने गले की चेन में लटक रहे लॉकेट को छूती,निहारती और अश्रुधारा बहाती।लगभग पाँच घंटो से ही,काम के बीच- बीच में ये क्रम चल रहा था।

आज ही तो स्वीटी को ट्रेन में बिठाकर कर आई।इससे पहले कभी बाज़ार तक भी अकेली नहीं निकली थी।आते ही बिस्तर पर निढाल हो गयी और लौट गई 22 वर्ष पूर्व मेहंदी लगे हाथों को निहारने।कितनी ख़ूबसूरत लग रही थी वो अपने विवाह के दिन।शिशिर उसे निहारता ही रहा था रात भर।परिवार वालों ने ही अब तक बातें की थीं आपस में,शिशिर और शम्पा पहली बार बात कर रहे थे,मगर सारी रात ही कम पड़ गयी थी बातों के लिए।

पहली सालगिरह पर शम्पा ने स्वीटी दी थी शिशिर को उपहार में और शिशिर लॉकेट बनवा लाया था जिसमें लिखा था,'जन्मों तक तुम्हारा'।

अचानक घंटी की आवाज़ से शम्पा की तंद्रा टूटी थी।दरवाज़ा खोला तो ,पड़ोस की सड़क में रहने वाली चाची आयीं थी।शम्पा को देखते ही चिल्लाकर रोने लगीं थीं वो,शिशिर को कहाँ भेज दी शम्पा,मुझे बाज़ार अब कौन ले जाएगा।कितना ख़याल रखता था वो पूरे मोहल्ले में सबका।मैं गाँव क्या गयी यहाँ की तो दुनिया ही बदल गयी।शिशिर,शिशिर,,,और वो बहुत देर तक शम्पा को गले लगा बिलखती रहीं।

आज 15 दिन हो गए थे शिशिर को रुख़्सत हुए।स्वीटी पिछले ही वर्ष इंजिनीरिंग ख़त्म करी थी और अब एमटेक कर रही है।बहुत ख़ुश थे शिशिर,अपनी इकलौती बेटी की शिक्षा से और कितने ही सपने देख डाले थे दोनों ने मिलकर अपनी लाडली के ब्याह के।

25 दिन ही हुए थे जब कुछ अन्जान लोग शिशिर को घर पहुँचा गये थे,सड़क से उठाकर।डॉक्टरों को समझ ही नहीं आया था उस दिन पहली बार इस तरह का चक्कर शिशिर को क्यों आया था।10 दिन बाद तो चलता-फिरता शिशिर हमेशा के लिए ही चला गया था।कल हॉस्पिटल से फ़ोन आया था कि शिशिर की रिपोर्ट आ गयी हैं,उसे कैंसर था।

शम्पा और शिशिर का देखा सपना,पच्चीसवीं सालगिरह से पहले स्वीटी के विवाह का,ईश्वर के कटु निर्णय के आगे ध्वस्त हो गया था वो भी बिना इत्तला दिए।

शम्पा अब भी अपने लॉकेट में लिखे शब्दों को महसूस कर रही थी,'जन्मों तक तुम्हारा'।


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