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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

केले का छिलका

राजीव कुमार

जब तक कोई बहुत बड़ी बात न हो, तबतक कोई बात ही नहीं बनती है। जब तक कोई फरमान जारी न हो तबतक नुकसानदेह स्थिति को भी ज्यों का त्यों रखा जाता है। भदरिया नगर में गंदगी का बोलबाला था। सफायी वाला भी उस जगह सफायी करने में हिचकिचाता था। हर महीने सफायी का गलत रिपोर्ट तैयार हो जाता था। मंत्री जी का काफिला तो दुर की बात है। ऑफीसर लोग भी मुआयना करने नहीं आते थे। डी0सी0 साहब की पत्नी को किसी काम से मजबूरीवश वहाँ जाना पड़ा। क्या करती वो तान्त्रिक उसी नगर में रहता था। डी0सी0 साहब की पत्नी की चाल देखकर सब हंस रहे थे। वो एक पाँव सड़क पर रखती तो दूसरा पाँव किस पर रखूं? यह सोचकर लड़खड़ा जाती और अपने कदम वापस कर लेती। नाक को अपने उंगलियों से दबाए नासमझी और बौखलाहट में जिस सख्त चीज पर कदम जमाने की कोशिश की, वो गोबर निकला और उनके पैर और साड़ी में गोबर लग गया। तबतक हर चीज बर्दाश्त करती गयी क्योंकि कौन सा उनको रोज-रोज आना था। अब साफ-सुथरी जगह पर पहुंची तो अचानक पैर फिसल गया। केला का छिलका फर्श पर पड़ा था शायद किसी ने अपने घर से ही घुमा कर फेंक दिया था। मैडम को अंदरूनी चोट आई थी। सब देखने वाले ठहाका लगाकर हंस रहे थे। कुछ लोगों ने उनको सहारा देकर उठाया। बात आई-गई हो गई। एक सप्ताह के अन्दर पूरे नगर की सफायी हो गई। केले का छिलका अपना काम कर गया।


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