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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

वाह रे डकैत

राजीव कुमार

सुदर्शन अग्रवाल की हवेली में अक्सर लंगर लगते ही रहते थे, जहाँ सारे गरीब-अमीर पेट कर भोजन करते थे। पूरे शहर में उनकी बड़ी चर्चा होती थी। भगवान की दया से गरीबों की दुआ से रूपये-पैसों की कोई कमी नहीं थी। सुदर्शन अग्रवाल चार-पांच मिल के मालिक थे। उनकी हवेली में नौकर-चाकर भी दर्जनो थे और तो और उनके आस-पास भरोसेमंद, जरूरतमंद और जरूरत से ज्यादा अक्लमंद रिश्तेदार मंडराते ही रहते थे। जिस तरह से दीमक अन्दर ही अन्दर खोखला करता जाता है ठीक उसी प्रकार उसके अक्लमंद रिश्तेदार उनकी हैसियत को भीतर ही भीतर खोखला करते गए। खुद तो घोटाला किया ही, मिलों को हड़प लिया और हवेली में डकैती भी करवा दी। एक दिन ऐसी हालत हो गई कि गरीबों का पेट भरनेवाला सुदर्शन अग्रवाल अपनी पत्नी और बच्चों के साथ दर-दर की ठोकरें खाने लगा और दाने-दाने को मोहताज हो गया। सुदर्शन अग्रवाल ने हिम्मत नहीं हारी, पत्नी और बच्चों को भुखा नहीं देख सकते थे इसलिए अपने ही मिल में मजदूरी करने लगे। मिल के दरबान और मजदूरों ने उनसे हमदर्दी दिखायी मगर नए मालिक के डर से वो लोग भी अजनबी सा व्यवहार करने लगे। दरबान ने उनको धक्के मार कर निकाल दिया। सुदर्शन अग्रवाल ने वो शहर ही छोड़ दिया। एक छोटे से मिल में मजदूरी करने लगे। वो अपने परिवार के साथ लंगर की पंक्ति में लगे थे, अचानक उन्होंने पूछ लिया ’’ बहुत देर से तुम हम लोगों को देखे जा रहे हो, पहचानते हो क्या? ’’ लंगर का संचालक जो हुष्ट-पुष्ट थ, सुदर्शन अग्रवाल का प्रश्न सुनकर युवक के आँखों में आँसु आ गए और कहा ’’ आपकी इस हालत का जिम्मेदार मैं भी हूं। ’’

सुदर्शन अग्रवाल ने आश्चर्य ये पुछा ’’ क्यो भाई ? ऐसा क्यों बोल रहे हो? यह तो हमार भाग्य है, और फिर हम लोग तो इस शहर में नए हैं। तुमको हमारे हालात कैसे मालुम? ’’

लंगर संचानक ने कहा ’’ आपने हमको पहचाना नहीं। मैं उस दिन नकाब में आपके सामने आया था। मैं उन डकैतों में से एक हूँ, जिसने आपके घर में डाका डाला था। ’’

सुदर्शन अग्रवाल ’’ अच्छा तो आप हैं वो महानुभाव? अब क्या चाहते हैं? भोजन भी हम लोगों की छीन लोगे क्या? ’’ सुदर्शन अग्रवाल वहां से जाने लगे तो वह डकैत सुदर्शन अग्रवाल के पैर पर गिर गया और कहा ’’ हमको अपने पाप घोने का एक मौका दीजिये, नहीं तो आपके चरणों में ही प्राण त्याग दूँगा। ’’ सुदर्शन अग्रवाल भी सोच में पड़ गए।

एक सप्ताह के भीतर ही मिल मालिक को डरा-धमका कर मिल वापस करवा दी। सुदर्शन अग्रवाल के मुँह से निकल पड़ा ’’ वाह रे डकैत, तू तो भगवान निकला। ’’


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