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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

कहते हैं जंगलराज है

राजकुमार तिवारी

हर जगह पर दल दल दिखता है अब कदम कहाँ रखे जायें जो लोग यहाँ बेदल ठहरे आखिर सब वो कहाँ जायें। हर जगह ................. जुमले नये नये देखो कैसे सभी फेंक रहे। अपने मतलब की रोटी यहाँ सभी अब सेंक रहे भाई चारे वाली बातें आखिर सुनने कहाँ जायें। हर जगह................. अब न्यायधीश भी बोल रहे कहते हैं जंगल (राज) है जरा गौर से तुम भी देखो तो कहाँ पे मंगल आज है हर कोई यहाँ कराह रहा सत्संग कहाँ सुनने जायें हर जगह................. जो यहाँ जाति में उलझ गये वो नही उबरना चाह रहे रूप रंग के मानवता में वो नही निखरना चाह रहे जिसने सबको यहाँ बनाया उसे हाल बताने कहाँ जायें हर जगह.................

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