मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

उन्मुक्त पंछी

राजीव डोगरा

उन्मुक्त गगन का पंछी हूँ दूर कही जा उड़ जाऊंगा। लेकर तेरी यादों को संग अंबर की छोर में जा अकेला कही छुप जाऊंगा। ढूंढेंगी तेरी अखियां तलाश करेगी तेरे दिल की हर धड़कनें। पर मैं तेरी यादों की नाव ले समुंदर की गहरी ओट में कही जा छुप जाऊँगा। तुम ढूंढगे मुझे टूटी हुई अपनी हर अनुभूति में। तुम तलाश करोगें मुझे बिखरी हुई अपनी हर अभिव्यक्ति में। पर मैं तुम्हें मिलूंगा उस अनंत ईश्वर की अब छोर में। क्योंकि तुमने मुझे छोड़ दिया था जीवन के हर मोड़ में।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें