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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

'महारास'
( प्रकृति-पुरूष मिलन)

केतन यादव

हिय जोर जोर मन कोर कोर रस बोर बोर हैं बनवारी अब रास रंग सब अंग अंग हैं तंग तंग राधा प्यारी । नटवर गिरधारी मगन आज चहूँ दिशा रही है झूम झूम तृण - तृण अधीर है वृंदा का हर्षित वन कलियाँ चूम चूम। हर गोपी संग संग में राधा कभी इधर इधर कभी उधर उधर विह्वल तन मन रग दंग दंग कान्हाँ राधा संग जिधर जिधर। पूनम नीशीथ उर महाप्रीत जग के स्वामी भूलोक आज बाजत ढोलक डमरू मृदंग मंजुल शशि सम तन धवल साज। अति शरद चंद्र की घटा रूचिर और रम्य रम्य कान्हाँ राधा सब देव चले निज धाम छोड़ वृंदा में कटे सभी बाधा । सब प्रेमयज्ञ में प्रेमाहुति बन प्रेम तत्व की ओर चले इस प्रेम लोक का प्रेम सूर्य अब प्रेम निशा में मिले ढ़ले। अब प्रेम जन्म में प्रेम जीव बन प्रेम अर्थ को पाना है सब अर्थ व्यर्थ बस यत्र -तत्र अब प्रेम मंत्र पहुँचाना है । अनुरक्ति प्रेम तो मुक्ति प्रेम है भक्ति प्रेम उस ईश्वर का तप ध्यान मंत्र सब रिद्धि सिद्धि है प्रेम योग योगेश्वर का । जहाँ रास मगन त्रिभुवन स्वामी उस ब्रज रज में है मुक्ति सकल कहो रास बिहारी की जय जय हरि नाम भजो हर जन्म सफल।

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