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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

दिवाली की खुशियाँ

गरिमा

हमने कहा प्रिय - आओ दिवाली मनायें खुशियों का रंग सबके चहरे पर ले आयें दिए की लौ से हर तरफ अँधेरा दूर भगायें जैसे ही दिया हमने जलाया देखा दूर कही अँधेरा फैला है और बच्चों की सिसकती आवाज़ मेरे दिल को भेद रही है हम वहाँ गए तो देखा करुण क्रन्दन हो रहा था सब बैचेन थे कैसे दिवाली मनायें जब पड़ोस में अँधेरा हो तो प्रिय हम कैसे दिवाली मनायें फिर दिए लाकर दिए हमने और मिठाई से शुभ किया हमने बच्चो को पाटखे दिए हमने फिर भी दिल उदास है कैसे मनायें दिवाली हम माँ की आखो में वो सूनापन क्या त्यौहार हमारे नहीं हैं बच्चे दूध और अच्छा खाने को तरसे तो प्रिय ऐसे में कैसे दिवाली मनायें हम


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