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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

गरीब की दीवाली

अनिल कुमार

एक गरीब की मजबूरी और एक अमीर का हाल सुनिये, साहब दीपों से धरती सजने वाली थी गरीब के घर में भी दीवाली आने वाली थी उत्सव का समागम होने वाला था पर गरीब के घर में तो फैला तम का दीवाला था वह कैसे खुशी मनाता जबकि उसके घर में दो वक्त का कहाँ निवाला था इसलिए वह चुपचाप सा बैठा अपने घर में कुछ सोच-विचार रहा था खाली पेट से अपनी जेब निहार रहा था तभी अचानक उसको कुछ याद आ गया मुर्झाये चेहरे पर कुछ खुशी का आभ आ गया सहसा वह दीवार थामकर खड़ा हो गया नंगे पैर ही अपनी दहलीज लाँगकर एक धनपति के घर उधार माँगने आ गया जब पहुँचा वह उस देनदार के घर तो साहब चेन से बैठे आराम फ़रमा रहे थे रेड़ियो के संग वह भी कुछ गुनगुना रहे थे तभी गरीबदास ने दरवाजा खटखटाया अनुमति पाकर वह घर के अन्दर आया पहले नमन किया उसने शिश झुकाकर फिर अपना दुखड़ा साहब को सुनाया पर साहब तो पैसे वाले थे इतनी आसानी से कहाँ कर्ज देने वाले थे कुछ गिरवी रखने को कहते थे फिर जाकर कुछ पैसा वो कर्ज में देते थे था नहीं पर उसके पास कुछ देने को जमीन तो पहले ही गिरवी पड़ी थी पर समस्या भी तो दीवाली की आन पड़ी थी फिर कैसे खाली हाथ वो जाता इसलिए उसने एक बार फिर सोचा था घर बचा हुआ था उसका पुस्तेनी तो कर आया उसका भी वो सौदा था और कर भी क्या सकता था वह मजबूरी में गरीब ही तो ठहरा इसके सिवा गिरवी और रख क्या सकता था बस उसको एक चिन्ता सता रही थी इस दीवाली तो जैसे-तैसे काम निकल जायेगा पर अगले बरस फिर यह दीपोत्सव जब आयेगा तब गिरवी रखने को वह क्या लायेगा...।

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