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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

मजहब के हम मारे हैं जीते नहीं हम हारे हैं

विद्या शंकर विद्यार्थी

मजहब के हम मारे हैं जीते नहीं हम हारे हैं कोई भी दिल से कह दे तम के नहीं मारे हैं झाँका नहीं किसी ने अपने अंदर की दुनिया देखा तो बस दरपन में सोचा नहीं दुबारे हैं मजहब औ दरपन में कुछ फर्क नहीं पाता हूँ टूटते हैं जब दोनों तो होते नहीं वो हमारे हैं किसी भी बस्ती में विचारवान कम मिलते हैं भीड़ नहीं मजहब में मिलते हैं वो किनारे हैं आदमी की आदमीयत में खुदा की सादगी है सादगी को छोड़ आये हैं सड़क के किनारे हैं।

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