मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

बनो इंसान भी

शुचि 'भवि'

आदमी हो तो बनो इंसान भी काम है मुश्किल मगर आसान भी दर्द ही देना नहीं है आपको ज़िम्मेदारी है मेरी मुस्कान भी देख सुन्दर हैं नज़ारे बाग़ में हरकोई ख़ुश और हैं भगवान भी जो भी मर्ज़ी आपकी कहते रहो भूलना हरगिज़ नहीं एहसान भी आपको दौलत मिली यश साथ में सर नवां कर कीजिये सम्मान भी लाख चाहे कह दो बातें यार को पर न उसका हो कभी अपमान भी घर सज़ावट से लगे सुन्दर सदा जिसमें 'भवि' आते रहें मेहमान भी

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें