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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

सुनसान ज़िन्दगी

नरेन्द्र श्रीवास्तव

काली अंधेरी रात सी सुनसान ज़िन्दगी। कटती नहीं है काटे से,वीरान ज़िन्दगी।। साथी था साथ में तो रही ज़िन्दगी हसीन। महके हुए गुलाबों का बागान ज़िन्दगी।। तन्हा हुए हैं जब से,ज्यूं मधुवन उजड़ गया। गुमसुम सी हो गई है ये बेजान ज़िन्दगी।। माना कि मोहब्बत है ख़ुदा का दिया तोहफा। इसमें भी है नसीब पर हैरान जिन्दगी।। मेरी वफा पे मुझको है ख़ुद इतना ऐतबार। ख़्वाबों की भरती आज भी उड़ान जिन्दगी।।

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