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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 72, नवंबर(प्रथम), 2019

गजलों को मेरी तू तहजीब न सिखा

अजय प्रसाद

गजलों को मेरी तू तहजीब न सिखा मतला,मकता, काफ़िया, रदीफ न सिखा । कितनी बार मात्रा गिरा है बहर के वास्ते कैसे लिखते हैं दीवान ये अदीब,न सिखा । देख ले शायरी में शायरों का हाल क्या है किस कदर दौलत से है गरीब न सिखा । महफ़िलें,मुशायरें,रिसाले मुबारक हो तुझे मशहूर होने की कोई तरक़ीब न सिखा । गुजर जाऊँगा गुमनाम, तेरा क्या जाता है शायरी मेरी है कितनी बदनसीब न सिखा । हक़ीक़त भी हक़दार है सुखनवरी में अब ज़िक्रे आशिक महबूब औ रकीब न सिखा । मेरी आज़ाद गज़लों पे तंज करने वालो मुझे कैसे है करनी खुद पे तन्कीद न सिखा ।

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