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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



तेरे नाम के धागे


शुचि 'भवि'


    
तेरे नाम के धागे अब तक ही
कहीं बाँधे ही नहीं हमने
ख़ुद को ही बाँधे हैं
तुम सँग 
हर अदृश्य
धागे से
मन्नत में क्यों माँगू तुम्हें
जब साथ हैं हम
युगों से ही
मिलते-बिछड़ते
जीवन -चक्र के क्रम में...

रोली मेरी का रंग 
तुमसे होता हुआ 
उतरता है गालों पर
होती है हर दिवस ही तो
होली और लगता है
गुलाल प्रीत का,,,
ख़ुद से कर अलग
कैसे बाँध आऊँ 
मैं तुम्हें
मन्नतों में...

सुनो
तुम ही बाँधते आये हो हमेशा
मुझे दिल से निकाल-
पेड़ों पर,खम्बों पर,
डरते हो न
खो न दो कहीं मुझे
दुनिया की भीड़ में
मगर
मैं क्यों नहीं डरती
तुम्हारी ही तरह???

निडर जिस युग हो पायेंगे
हम दोनों ही
एक साथ
उसी युग में होगा
देखना 
अपना भी मिलन
तब तुम होगे 
मेरी मन्नत
और 
मैं तुम्हारी....
 

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