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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



नहीं हो सकता


लवनीत मिश्रा


   
हवा चल रही तेज़ ..
पर जितनी भी तेज़ हवा चले..
मुझे उड़ाके आप के पास तो नहीं  ले जा सकती!!
बारिश बरस रही है खूब..
पर जितनी भी बारिश बरसे,
मुझे बहके आप तक पंहुचा तो नहीं सकती!!
ट्रेन हो गयी है गतिशील ..
पर जितनी भी ट्रेन गतिशील हो, 
हमारा बिछड़े हुए पल में 
हमे खड़ा तो नहीं कर सकती!
सूरज दे रहा है किरणे ..
पर जितना भी रौशनी हो, 
हमारी आँखों में बसी हुई
रंगीन किरण तो नहीं हो सकता!!
फूलों के बाग़ में एक पुष्प मुझे छू गयी..
हज़ारो लाखो फूल मुझे स्पर्श करें, 
आपके छुवन की मह्सुश तो नहीं हो सकता !!
रात हो रही है गहरी...
पर जितनी भी रात गहरी हो..
हमारे मुहब्बत के जैसा तो गहरी हो नहीं सकती !!
 

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