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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



आलोक पर्व


कंचन अपराजिता


 
घर मे ही दीयें क्यों जलाये
चलो उन अंधेरे चौराहे को 
रौशन कर आयें
जिन राहों से होकर 
अनेक पथिक गुजरते हैं।

घर को ही क्यों सजाये
चलो उन बस्ती को
साफ कर आये 
जिन गलियों मे कूड़े
के ढ़ेर रहते है।

घर मे ही रंगोली
क्यों बनायें
कुछ उदास सा हैं
ये भिखमंगें का बच्चा
उसके शाम रंगीन बनाते हैं।

घर मे बनी हैं
अनेक स्वादिष्ट पकवाने
पर उसके निवाले से पहले
जिनके चूल्हे नही जले
उन्हे रोटी तो बाँट आते हैं।

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