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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



वक़्त


गरिमा


 
वक़्त के साथ हर याद
छोड़ गया हर निशान,
रह गयी धुंधली सी याद
वो जमाना जब हम किया
करते थे मस्तियां,
पर अब सब  खत्म सा
हो गया,
खो गयी कही वो सुनहरी यादे,
वक़्त के साथ
अब तो याद है,
काम काम काम
क्यों हो गए  बड़े?
आ गयी जिम्मेदारियां
और बस संघर्षों के साथ
पूरी  करने लगे हम
और बढ़ने लगे की कैसे
बढ़ा  जाये उंचाई पर
इसी में बिता दी, 
जिन्दगी के हसीं पल हमने
और वक़्त उड़ गया पता नहीं कहा
और बस रह गयी यादे।।		 
 

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