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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



अमृतसर का रावण


डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा 'द्रोण'


  
ऐसा जला अमृतसर का रावण 
अपने साथ न जाने कितनों को
समेट कर, लेकर चला गया 
एक शैलाब सिसकता छोड़
साथ रावण के जल गई 
सैकड़ो परिवार की जिन्‍दगीयाँ
बेघर हो गए सभी ऐसी बन गई 
अनेक घरों की कहानियां।

हम एक दूसरे पर 
दोषारोपण करते रह गये 
दोषी कौन था इसकी 
बस तलाश करते रह गये।
रावण क्या जिंदा था
जिसे जलाने सब घर द्वार
छोड़ देखने उमड़ पड़े
रावण तो था ही नही 
उसकी जगह स्वयम को 
मौत के घाट उतार गए।
 

सही पूछिये तो दोषी 
न रेल और न प्रशासन है, 
न वह ड्राइवर, न पुलिस, 
न कोई अफसर और 
ना ही उसके आयोजक। 
दोषी तो हम हैं, सब दोषी है 
कौन इस घटना का,
क्‍योंकि हम ही तो गये थे
अपनी गरीबी भूल मौज मस्ती
और चंद खुशियों के पल जीने को।

ठेले पर बिकते चाट-पकौड़े को 
पॉंच सितारा होटल के 
लजीज व्‍यंजन की भॉंति खाने को
वह हम भूल गये थे
कि एक-एक मत पाकर, 
जिले के, प्रान्‍त के और देश की 
कमान संभालने वालो की 
सुरक्षा में लगे सैकड़ो 
शासन-प्रशासन के कर्मचारीयाें को 
गरीब जनता की 
सुरक्षा से कोई सरोकार नहीं। 

हादसो का क्‍या है होते रहेगें, 
जिसका लिखा है वह जाता रहेगा, 
यह होनी-अनहोनी तो 
सब काल का चक्र है, 
इसके लिए क्‍यों कोई दोषी
दोषी हो भी कैसे कोई जैसे 
गरीबो के लिए तो 
संविधान में इतने छेद हैं 
जिसको देख कर शायद चलनी भी 
शर्म से पानी-पानी हो जाये। 

सबको समझना चाहिए था 
कि रेलवे ट्रैक रेल के लिए होता है, 
इंसानो के लिए नहीं, 
उसे समझना चाहिए था 
कि रावण के जलने के बाद 
होने वाले धमाको से बचने के लिए 
वह भला कहाँ जायेगा। 

ये गलती सबकी है 
कि सबने उस ट्रेन की 
आवाज को क्‍यों नहीं सुना। 
आयोजक, पुलिस तो 
मुख्‍य अतिथि की सेवा में रहेगें, 
वह तो बिन बुलाया मेहमान है, 
जो शायद आयोजको को 
एक रूपये चंदा भी नहीं दे सकता, 
ऐसे में हम किस अधिकार से 
किस हक से अपनी सुरक्षा के लिए 
शासन- प्रशासन पर निर्भर है। 

दोष किसका था सजा किसे मिले, 
खुद को गँवाकर, 
अपने परिजनो को गवां कर, 
अपने अंग भंग करा कर। 
उसे तो खुश भी होना चाहिए 
कि उसकी गलती पर भी 
लाशो के सौदागर उसकी 
लाशो को रूपये से उसे तौल रहे हैं। 
दिन रात खोज रहे हैं 
कारण इस घटना का, 
अपने घर से घटना स्‍थल एक किये हैं।
 
एक दूसरे पर दोषारोपण 
जैसा महान कार्य कर रहे हैं, 
ऐसे में आप उनके 
इस महान कार्य को समझे, 
उस पर पानी न डाले, 
उनकी भावनाओं , 
उनके अरमानो को 
उनपर दोषरोपण कर व्‍यर्थ न जाने दें। 

मैं जनता से अपील करता हूँ 
कि गलती किसी की नहीं, 
गलती केवल उस पागल जनता की है
जो अपने खुशियों के चंद पल 
तलाशने अपने पैरो पर गये  
और न जाने किस पर लौट कर आये
अपने घर को सूना कर, 
रोता बिलखता , बेसहारा
चिरागों को बुझा कर
निशब्द होकर
जाने किस आगोश में
एक नई दुनिया में
हमेशा हमेशा के लिए चले गये।		 
 

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