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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



पत्तियाँ डा़लियों पर


अशोक बाबू माहौर


 
पत्तियाँ 
डा़लियों पर 
ड़ालियाँ लहराती 
होती मस्तमौला 
झूलती झूला 
जैसे आ गया सावन 
बनठन कर 
द्वार। 
पत्तियाँ 
खूब हँसती 
गाती मस्त होती 
भूल जाती 
पुरानी यादें 
नयी उमंग भरती 
उतावली सी।		 
 

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