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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



जो दबे पाँव


अमरजीत टांडा


 
जो दबे पाँव
चले जाऐ
चुप सी दामन में लपेटे
ऐसी ख़ामोश रात को
क्या सुनाउोगे अपने रोने की आवाज
गीतों का तरनम संगीतक कला
जो न रोऐ और न हँसे
हम ने क्या लेना 
एेसी ख़ामोश सी ठंडी सी शाम से
क्या करेंगे नीला सा आसमां उड़ता हूया
महल कांच का आँधी से कांपता
जुलफें भी नहीं सजाऐंगी
रेशमी तारें 
आँसू खारे भी नहीं बन पाऐंगी
चाँद की रिशमों का क्या करोगे
घुल न सकेगी जो मेरे सभी गुनाह
चाँद की लिशकती साबुन की टिकीया कया काम
कया करूँगा 
धूल सी सन्नाटों की 
छनछन सी पायलों की
कभी नींद से जागे 
मेरी हिज्र की रातों को सुला दो
मेहरबानी होगी
दिल-ए-ज़ार
की जरूरत क्या है
रोते जख्म जब कोई भरता ही नहीं
भूखे बच्चे क्या करेंगे 
मेरे महँगे खिलौनें की रंगत चाहत में वसा कर
बिखरते सितारों 
टूटे हुए चांद से 
कैसे बनाऊं कोई आसमां
मैं ने तो अपने हत्यारे के 
क़दमों के सुराग़ ढूँढने हैं अभी
जो अजनबी सी ख़ाक ने बुझा दीये है
मुक़फ़्फ़ल करना अभी
ख़्वाबों के दरों का तख़य्युल
अब मेरे शहर कोई 
आसमां न ही गिरे तो अच्छा
 

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