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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



झील सी गहरी


अमरजीत टांडा


 
झील सी गहरी 
अगर आँखें न होती
तो किसने मरना था डूब कर
नैनो की शोख 
अदाऐं न होती
तो किसने गुम हो कर मिटना था इन में
जैसे तेरे ख्वाबों ने लूटा है
लुटा रहना चाहता हूँ ऐसे में ही
यह है डर अब
कि कहीं यह तेरी चाहत के 
ख्वाब न लुट जाऐं
शर्म शार सा हो जाता है मौसम
तेरे चेहरे का नूर देख चमक में डूबे
चाँद भी शर्मा का छुप जाता है
सजी थी वो रात तू आई तो
तू चली गई तो महफिल बिखर गई थी
जब तू मेरी बाँहों में 
दुल्हन बने खिली
फूलों की तो सेज थी
महक तेरे बदन से मिली थी उस रात को
चाँद को देखा था घूँघट में 
उस रात पहली बार 
दिल की धड़कन थम गई थी 
देख कर तुझे
चेहरे पर आ गया था
इश्क का रंग उस समय पवन में
पहली सर्द रात में 
जो दो चार साँसे बची थीं
शोला बन कर टकराईं थीं
जब लबो की उड़ती लाली को 
चुराया था बाँहों में जकड़े
ऐसे सारूर जैसी अभी तीक
विसकी न बन पाई कहीं
जब छूया था शोख बदन को
धरती कांपीं थी
पायल छनकी थी
कंगन फिसले थे
टिक्का बिखरा था गिर कर
चुप जैसा शोर मचा या रात के छणो में
प्रेम की आग में 
डूब गए थे दो समंदर अंगारों भरे
खराब थी कुछ कुछ 
आप की नज़र भी
काफ़िर होना था 
मैं ने भी अभी थोड़ा थोड़ा सा
महकती कलियां टूट कर
गिर पड़ी थी उस पल बकत के पायों में
निराली रात-ऐ-सुहाग
के बारे में क्या बतलायें
शोख मतवाले पलों की
क्या लिखें कहानी
सफलता मिलनी थी 
अभी तो मेरे शौक़ को
आफताब होना था नज़ारों ने
बे-हिज़ाब हो जगना था 
तेरे हुस्न ने सुगंधीयों मे मिल कर
चाँद क्यों छुपा रहा बादलों में
चांदनी क्यों पड़ी रही मंद हो कर
इस का जुआब
शोखियां देंगी तेरे जौबन की
आखिर किस तरह 
हुस्न पर नज़र ठहरी
रुखसार हुऐ फूल ही बता सकते हैं
वो बदन-ऐ-शफ़्फ़ाफ़ 
ही बता सकता है या उस रात का चांद
बेचैनी की बात मत कर
अभी तो सारूर-ऐ-शराब होना है
खून-ऐ-दिल साँस साँस ने
रात को अभी गछ पड़ना था
गरूर टूटना था अभी सितारों का
इंतेख़ाब ऐं तू मेरा
इस पर भी मुझे गर्व है
लाजवाब है तेरी सादगी
कभी अगन की तरह जल

 

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