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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



सब क्षणभंगुर


डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना


 
रंग रूप का
धन रख ले
रेशम सरिस
बयन रख ले

प्रेम कंत है
स्नेह संत है
सब क्षणभंगुर
यह अनंत है
मीरा से मोहन का
था जो
वही प्रेम बंधन
रख ले

गंगा मन हो
यमुना तन हो
ह्रदय गेह में
वृंदावन  हो
विष व्यापत  ना
पल भर जिसमें
संग वही
चन्दन रख ले

सबके सब
अमृत ही पीते
पर लगते
रीते के रीते
सुख पाना है
पलभर, पर की
भूख प्यास
क्रन्दन रख ले

हरा वृक्ष  क्यों
पत्ते पीले
दृग  संबंधों
के क्यों गीले
खग आशा का
आश्रय  पा ,ले
भाव में  वह
उपवन ,रख ले		 
 

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