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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



अधूरापन


डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना


 
तू  सदा ही
दीप्तियों  में
स्नेह सिंचित
उक्तियों  में
हार जाता
अधूरापन
सहारा तू
रिक्तियों में

तुमसे  निः सृत
सौम्यता  है
आध्यात्मिक
घृतियों में
श्रेष्ठ , मानव
युगों  से  है
विश्व की
संस्कृतियों  में

रहे  स्वर
परमार्थ का ही
मानवी
प्रवृतियों  में
दृष्टिगत गरिमा
हो तेरी
सर्वदा
सुकृतियों में

संस्कारों में
सुयश है
धार  ले  निज
वृतियों में
तथागत का
मन्त्र  गुँजें
साधना की
उक्तियों  में		 
 

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