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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



फैला घोर अन्धेरा


देवेन्द्र कुमार राय


  
फैला घोर अन्धेरा।
नभ से लेकर तल तक
कल से लेकर अब तक
सबको भ्रम ने घेरा।

राहों पर चलते जाता हूँ
हर तरफ यही मैं पाता हूँ
लगा है तेरा मेरा।

घनी रात का सन्नाटा है
धूमिल प्रकाश की
सशंकित आशा है
होगा कब सबेरा।

जहां तक जाता हूँ
केवल दर्द को पाता हूँ, 
शुरू हो प्रेम का सिलसिला
ऐसा कोई नहीं मिला, 
छल, छद्म, धोखा का
हर तरफ लगा है डेरा।
फैला घोर अन्धेरा।		 
 

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