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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



वफ़ा का ही मतलब जफ़ा हो गया है


शुचि 'भवि'


    
न  मालूम  क्योंकर   ज़ुदा   हो  गया है
वफ़ा का  ही  मतलब जफ़ा हो गया है

कभी जिसको जीते थे हम हँसते हँसते
वो  जीवन  ही  हमसे  खफ़ा हो गया है

रही  दिल  में  यादें  ज़हर सी कभी जो
बदल   नाम  उनका  दवा  हो  गया  है

मुहब्बत  की  बातें  सभी  करते लेकिन
जो  गुज़रा  है  इनसे  फ़ना  हो  गया है

कली जो थी खिलने को आतुर सदा ही
जुनूं  आज  उसका   ख़ता  हो  गया  है

रहो  तुम  तो  हरदम ही अन्जान उनसे
पता  चलते  ही  क्या से क्या हो गया है

नहीं  बात  का  था  कभी अंत जिसकी
भला  मौन  'भवि'  की  अदा हो गया है
 

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