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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



बदल गए हो क्या


अनिरुद्ध सिन्हा


 
मोम बनकर पिघल गए हो क्या 
यार तुम भी बदल  गए हो क्या 

इस तरह  रंजिशें भी  ठीक नहीं 
ख़ुद से बाहर निकल गए हो क्या 

कोई अपना  नज़र  नहीं   आता
ख़ाक आँखों में मल गए  हो क्या 

मंज़िलों  तक  नहीं  पहुँच  पाए 
दाएँ-बाएँ  निकल  गए  हो क्या 

आँसुओं  से  भरी हैं  क्यों आँखें 
कल की यादों में ढल गए हो क्या           
 

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