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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

हीरो वाधवानी की पुस्तक "मनोहर सूक्तियाँ" की समीक्षा

समीक्षक:डॉ. राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"



*परिश्रम पारसमणि और पुखराज है -हीरो वाधवानी*

हीरो वाधवानी जी अजमेर राजस्थान में जन्मे देश के ख्यातिनाम सूक्तिकार के नाम से जाने जाते हैं। इनकी अदबी आइनो,प्रेरक अर्थपूर्ण कथन और सूक्तियाँ सकारात्मक सुविचार सकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियाँ कृतियाँ प्रमुख है। आपकी कृतियाँ निराश ,हताश,अवसाद, तनाव से ग्रस्त व्यक्तियों को जीवन जीने की नई राह बताती है। जीवन का सार छुपा होता है आपकी सूक्तियों में। प्रस्तुत कृति की हर सूक्ति व्यक्ति को नैतिक मूल्यों की शिक्षा देती है ।एक अच्छे समाज के निर्माण हेतु आज इन सूक्तियों की महती आवश्यकता है। प्रसिद्ध कवि डॉ. हरिओम पंवार आपके प्रशंसक है। आपकी हर सूक्ति मानव को सकारात्मक विचारों से भर देती है।

वाधवानी जी समाजसेवी भाषाप्रेमी सकारात्मक सोच वाले मृदुभाषी लेखक है जिनके जीवन के अनुभव से निःसृत ये कृति पाठको को सकारात्मक ऊर्जा से ओतप्रोत करने में सक्षम है। आपकी इस कृति में गहन चिंतन यथार्थपूर्ण दार्शनिक की तरह विचार बड़े आत्म मंथन से संकलित किये दिखते हैं।

पुस्तक की भाषा शैली मौलिक व विशिष्ट है। बोधगम्य है

हमारे देश के लेखकों संपादकों प्रसिद्ध कवियों चिंतकों आदि लगभग आठ दशक से अधिक विभूतियों ने समीक्षाएं लिखी है जो आपके व्यक्तित्व व कृतित्व से सम्बंधित है। पेज 218 से 246 तक।

गोपालदास नीरज जी लिखते है वाधवानी जी की पुस्तक पारस पत्थर की तरह हस अनुपम,अद्वितीय। संतराम पांडेय जी लिखते है आपकी पुसिक के हर पन्ने पर मोती जड़े हैं।

आपकी सूक्ति असंयमी इंसान को शैतान शीघ्र वश में कर लेता है। यह सूक्ति व्यक्ति को संयम से काम लेने की सीख देती है।

सिद्घांतों और नियमों को मानने वाला लोहा भी लकड़ी की तरह पानी मे तैरता है। इसलिए हमको भी समाज मे नियमो से रहना चाहिए।

आपने अपनी सूक्तियों में बताया कि मेहनत की कमाई का स्वाद ही अलग होता है। परिश्रम पारसमणि है पुखराज है। धनवान कौन होता है जिसका खर्च कम और आमदनी ज्यादा हो। घर का लड़ाई झगड़े से नींव हिल जाती है इसलिए परिवार में प्रेम से रहो लड़ो मत।

दुखी माँ के आंखों से बहने वेक आंसुओ से ईश्वर के पैर झुलसते है इसलिये कभी माँ को न सताओ जिसने तुम्हे जन्म दिया है। माँ का सम्मान करो।

आमजन को अंधविश्वास छोड़ने की सूक्ति के माध्यम से वाधवानी सलाह देते है अंधविश्वासी इंसानो के धन से ढोंगियों के घर बनते हैं।

बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि ईश्वर ने योग्य समझकर बुजुर्गों और बरगद के पेड़ों को अधिक समय दिया है इनका सम्मान करो।

मनुष्य नशे का आदी होता जा रहा है जबकि नशा नाश की जड़ है।जो मादक पदार्थो का सेवन करता ह वह एक साथ सौ गलतियाँ करता है।

व्यक्ति को सच बोलना चाहिए क्योंकि झूँठ बोलना स्वयं के साथ विश्वासघात करना है ।

हमें बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए पौधे जरूर लगाना चाहिए ।प्रत्येक घर मे पेड़ जितनी जगह न हो भले लेकिन गमले इतनी जगह अवश्य होती है।

जगह मिल जाये तो पेड़ भी लगाना चाहिए क्योंकि पेड़ों के लगाने से पृथ्वी समृद्ध होगी,अंतरिक्ष से लाये सोने से नहीं।

हमें ताजा व स्वादिष्ट भोजन ही ग्रहण करना चाहिए क्योंकि हमारा शरीर चोट ओर खरोंच को तो स्वीकार कर लेता है लेकिन दूषित भोजन को कभी स्वीकार नहीं करता।

ईर्ष्या व द्वेष छिपे हुए आतंकवादी है अतः अंतर के विजातीय गुणों को नष्ट कीजिये। तभी सुख व शांति मिलेगी।

व्यक्ति को हर क्षेत्र में पूर्णता का प्रयास करना चाहिये क्योंकि पूर्णता में अधिक शक्ति होती है पूर्ण चन्द्रमा आधे चाँद से नौ गुना अधिक चमकदार होता है।

मेकअप करने की होड़ में लोग अपना चेहरा बदसूरत कर लेते है। हीरो वाधवानी जी ऐसे लोगो के लिए लिखते है मेकअप सोने के ऊपर पीतल की पालिश है। ईश्वर ने इंसान को जितना सुन्दर बनाया उतना किसी को नहीं फिर भी लोग मेकअप करते है सुन्दर बनने के लिए क्योंकि उनको ईश्वर पर भरोसा नहीं।

जिसके साथ कौशल्या जैसी सास ओर सीता जैसी बहु हो वहाँ झगड़ा नहीं होता है। इसलिए रामायण पढ़ो। राम का चरित्र मर्यादा सिखाता है परिवार में रिश्तों को कैसे जिये कला सिखाता है।

जीवन मे निराश न हो कि मेरा कोई नहीं है । अरे सूरज चंद ईश्वर जैसे साथी साथ है जो तुम्हें रोज हवा पानी भोजन देते हैं। आप अकेले नही हो विवेक है साथ साहस आपके साथ है इस प्रकार जितने आपके पास सद्गुण है वे सभी आपके पास है फिर आओ कैसे अकेले हैं।

इस प्रकार इस कृति की हीरे की तरह कई सूक्तियाँ है जो जीने की कला सिखाती है। बेमिसाल अद्भुत अनुपमेय सूक्तियाँ दिल को छू लेती है। सभी एक से बढ़कर एक सीख देती है। संदेशप्रद,जीवन मे उपयोगी,शिक्षाप्रद कृति है

साहित्य जगत में ये कृति अलग पहचान बनाये ऐसी ईश्वर से कामना करता हूँ। बहुत बहुत बधाई आदरणीय हीरो वाधवानी जी।

कृति:- मनोहर सूक्तियाँ
लेखक:- हीरो वाधवानी
प्रकाशक:-के.बी.एस. प्रकाशन, सराय रोहिल्ला,दिल्ली
पृष्ठ:-246
मूल्य:-450/-
समीक्षक:- डॉ. राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"


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