मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

लॉक डाउन खुलेगा तब........

रिचा तिवारी

रात घनी होने के साथ- साथ मेरी सोच भी गहराती जा रही थी । पार्क के खाली झूले महीने भर से पसरे सन्नाटे को और भी गहरा रहे थे । शाम बालकनी में टहल रही थी,कि पड़ौस के फ्लैट से छोटे बच्चे की आवाज सुनी । शायद उसकी मां उसे पढ़ाने का भरपूर प्रयास कर रही थी, पर बच्चा ना पढ़ने के मूड में था I आवाज साफ सुनाई दे रही थी- मां आज नहीं कल। उसकी आवाज सुनकर ऐसा लगा, जैसे अपने कमरे से शाश्वत कह रहा हो, मां होमवर्क हो गया है, बाकी कल कर लूंगा । मैंने पलट कर देखा तो वहां कोई न था । शाश्वत से मेरी पिछली मुलाकात एयरपोर्ट पर हुई थी । वह मुझे छोड़ने आया था, उसके साथ उसके नानू और नन्नी भी थे । मुझे एक हफ्ते के लिए ग्रेटर नोएडा आना था। पर शाश्वत को छोड़कर आने का बिल्कुल मन ना था, पर आना भी जरूरी था। 8 साल के शाश्वत ने मुझसे पचासो प्रश्न पूछ डाले थे, मैं उसके प्रश्नों का जवाब देती जा रही थी। इस बार उसे अपनी माँ के साथ छोड़ रही थी । आज पहली बार मैंने मम्मी के चेहरे पर कोई शिकन न देखी, ना हीं मेरे दूर जाने का कोई दुख था। इस सब का केवल एक ही कारण था, शाश्वत। मम्मी का शाश्वत के साथ बचपन से ही एक खास लगाव है। वह उसके साथ सब कुछ भूल जाती हैं, दिन भर उसके साथ खेलती रहती हैं, ना उन्हें किसी चीज का होश होता है, ना ही परवाह, बिल्कुल बच्ची बन जाती हैं । किसी का कुछ भी कहना उन्हें नहीं भाता। उनको बस शाश्वत के मस्ती करनी होती है । उसका भी विशेष कारण है। शाश्वत जब 6 महीने का था, तो मैं उसे मम्मी के पास छोड़ गई थी । क्योंकि मुझे देहरादून जाना था। वापस आने मे 6 महीने लग गए ।इधर मम्मी का शाश्वत के साथ दिन प्रतिदिन लगाव बढ़ता ही जा रहा था, मम्मी को ऐसा लगने लगा था जैसे वह उनका चौथा बच्चा हो। वह हम तीनो भाई - बहनों से ज्यादा उसको प्यार करने लगी थी। दिन भर उसी के पीछे … उसको नहलाना, दूध पिलाना, खिलाना, सुलाना, तबीयत खराब होने पर दिनभर डॉक्टरों के चक्कर लगाना, उसकी नजर उतारना इन सब कामों में उन्हें खुद की भी याद न रहती । बस, उसके साथ खेलती रहती। समय गुजरता गया और 6 महीने यूं ही बीत गए। वापस आते ही हम शाश्वत को अपने साथ वापस ले गए , मम्मी खुद को संभाल नहीं पाईं थी। कई दिन तक ना मेरा फोन उठाया, ना बात की । पापा ने बताया था, ना उनसे खाना खाया जाता था और ना वह रात को सो पाती।

शाश्वत से उनका लगाव इस कदर है कि आज भी क्या मजाल मैं उसको एक भी थप्पड़ मार दूं, वह गुस्सा हो जाती, मुझसे बात करना बंद कर देती हैं। मुझे ही डांटती, तुम्हें बच्चे संभालना नहीं आता। वह अभी बहुत छोटा है ।उसको क्या पता ? शाश्वत और मम्मी लॉक डाउन पूरा का मजा उठा रहे हैं। यहॉ आते ही स्लिप डिस्क का दर्द बहुत बढ़ गया और मुझे ऑपरेट कराना पड़ा। आई तो मैं बस 1 हफ्ते के लिए थी। पर महीने भर डॉक्टर ने बेड रेस्ट बोल दिया। उधर शाश्वत की एक-दो परीक्षाएं बाकी थी। इधर सुशील ने उसे लाने की पूरी तैयारी कर रखी थी कि कैसे लाना है ? कितने दिन की छुट्टी लेनी है? अभी आपरेशन हुए 15 दिन ही बीते थे, कि लॉक डाउन हो गया। हम सभी अपने घरों में बंद हो गए। हम दोनों भी इधर और उधर लॉक डॉउन में फंस चुके थे , ना मैं जा सकती थी ना वह आ सकता था। वह रोज फोन करता है , वीडियो कॉल करता है, मॉ मैं कब आऊंगा? मेरे बर्थडे पर क्या होगा? आप मेरे लिए क्या खरीदोगे? हम दोनों उसे समझाते हैं, हालाँकि वह खुद भी बहुत समझदार है। लाक डॉउन की सारी खबरें वह देता है। कल बोल रहा था अब तो आप तो रेड जोन में हो, मैं ग्रीन जोन में हूं कैसे आ पाऊंगा? इधर मेरा भी उसके बिना रहना बहुत ही मुश्किल हो रहा है। पर इन सबके बीच किसी को सुकून है तो वह है उसकी नन्नी । उनको सुकून है कि शाश्वत उनके पास है, जैसे ही कोई लाक डाउन खुलने की बात करता है , शाश्वत को लाने की बात होती है,तो वह चुप हो जाती हैं ।वह कुछ नहीं बोलती। पर लाक डाउन का दिन बढ़ने का नाम लेते ही वह बच्चों जैसी खुश हो जाती है, कि कम से कम वो इतने दिन उसके साथ बिता लेंगी। मम्मी उसको उठाने से लेकर उस को होमवर्क कराने ,नाश्ता कराने, तैयार करने तक पूरा दिन उसके पीछे दौड़ती रहती हैं। वह बहुत खुश हैं ।शाश्वत उनसे लड़ता भी है, जिद्द भी करता है और लाड भी खूब लगाता है ।पर मेरा दिल यह सोच कर बैठा जा रहा है कि कब तक यह लॉक डाउन बढ़ता रहेगा? और कब तक शाश्वत मम्मी के पास रहेगा? कभी न कभी लाक डाउन खुलेगा और तब .........


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें