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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

लॉकडाउन !

अशोक वाधवाणी

आलोक एक बुजुर्ग को कभी किराने की दुकान पर, कभी सब्ज़ी मंडी तो कभी दवाइयों के दुकान पर कई बार देख चुका है। बाज़ार में जब वे धूप में निकलते हैं तो सर पर टोपी और आंखों पर काला चश्मा लगा रहता है। बारिश के मौसम में बरसात हो या न हो, उनके हाथ में छाता जरूर दिखता है। हर काम अनुशासित ढ़ंग से करते हैं। सामने वाला आयु में छोटा हो या बड़ा, सभी के साथ हंसते – मुस्कुराते गर्मजोशी से मिलते हैं। लॉकडाउन के समय में भी उनके चेहरे पर मनमोहक मुस्कान दिखाई देती है। आज वो सब्ज़ी मंडी में सोशल डिस्टंस रखते हुए सब्ज़ियां ख़रीद रहे थे। जब वो झोला उठाए घर की ओर जाने लगे तो आलोक ने उन्हें नमस्कार किया। उन्होंने भी मुस्कुरा कर अभिवादन किया। आलोक ने उनसे कहा, “ अगर आपको कोई आपत्ति ना हो तो कृपया अपना परिचय दें। कुछ देर मुझसे बातें करेंगे तो मुझे प्रसन्नता होगी। “ उन्होंने आलोक के कंधे पर हाथ रखकर आत्मीयता से कहा, “ मेरा नाम आत्माराम है। सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर हूं। मेरा बेटा, बच्चों – बहू के साथ दूसरे शहर में रहता है। बेटी इसी शहर में ब्याही है। और कुछ ? “ आप मुझे हमेशा चुस्त, दुरूस्त, तंदुरुस्त, स्वस्थ दिखाई देते हैं। क्या मैं आपकी उम्र जान सकता हूं ? “

“ शतक पूर्ण करने में सिर्फ़ 27 वर्ष बाकी हैं। “ आत्माराम ने मुस्कुराते हुए कहा। “ बुरा मत मानें सरजी ! लॉकडाउन की अवधि फिर से बढ़ा दी गयी है। इस संकटकाल में भी आपको लगता है कि आप सौ सालों तक जी सकेंगे “ आलोक ने जानबूझकर उन्हें कुरेदते हुए पूछा। “ हां , बिल्कुल। मेरा दृष्टिकोण सदैव आशावादी रहा है। कोरोना वायरस से वो लोग डरें जो सरकारी दिशा – निर्देश का पालन नहीं करते हैं। मैं किराना सामान और दवाईयां महिने की इकट्ठी लेकर रखता हूं। रोज़ाना दूध पड़ोस की दुकान से लेता हूं। सब्ज़ी मंडी हफ्ते में 2 - 3 बार ही जाना पड़ता है। भला हो सरकार का, जिन्होंने दूरदर्शन पर रामायण , महाभारत , चाणक्य, बुनियाद आदि पुराने सीरियल पुनः शुरू किए हैं। इससे हमारे समय का सदुपयोग होता है। दिमाग़ में नकारात्मक विचारों के लिए समय ही नहीं बचता है। मैं न्यूज़ चैनलों पर कोरोना की ख़बरें देखने की बजाय समाचार पत्रों में इस संकट की घड़ी में सामाजिक सरोकार से जुड़ी, पुलिसकर्मियों, स्वास्थ्यकर्मियों आदि की सिर्फ़ सकारात्मक ख़बरें ही पढ़ना पसंद करता हूं। मैंने संकल्प ले लिया है कि 100 साल पूरे होने की ख़ुशी में छोटा सा कार्यक्रम रखूंगा , जिस में सभी रिश्तेदारों, परीचितों, पड़ोसियों को बुलाकर जश्न मनाऊंगा। उस में तुम्हें भी जरूर बुलाऊँगा। “ आत्माराम का जवाब सुनकर आलोक गद्‌गद्‌ हुआ। आदरपूर्वक उनके पांव छूकर आशीर्वाद लिया। बढ़ती उम्र में भी उनके जोश , जुनून के जज़्बे के आगे आलोक नतमस्तक हुआ।


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