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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

कर्मों का फल

आशीष श्रीवास्तव

घर के बाहर गली में घूम रहे पड़ोसी रवि को रमेश ने बालकनी से देखा तो रमेश से रहा नहीं गया। बालकनी से ही बोले: भाई साहब! लॉकडाउन चल रहा है। रोड पर न निकलें, घर में ही रहें।

रवि: मेरी ऊपर वाले में पूरी आस्था है, मुझे कुछ नहीं होगा, डरें वे जो ऊपर वाले को नहीं मानते। रवि की आध्यात्मिक बातों को सुनकर रमेश ने समझाया: ये आपका-हमारा अंदरूनी मामला है। मौसम जाति-धर्म नहीं देखता। गर्मी में निकलोगे तो गर्मी लगेगी ही। सर्दी में निकलोगे तो ठण्ड भी लगेगी ही। कर्मों के फल से कोई नहीं बच सका आज तक।

रवि कुछ और कहता इससे पहले ही रमेश ने एक और तर्क दे डाला: बारिश से बचने के लिए आप छाता लगा सकते हैं, छीटें तो फिर भी आएंगे ही। बारिश को आप नहीं रोक सकते। संभल जाइए। आपको देखकर और लोग भी बाहर निकल आए तो स्थिति बिगड़ते देर नहीं लगेगी।

इतना सुनना था कि रवि निरूत्तर हो गया। कहने लगा: सही कहते हैं आप भाईसाहब। कोरोना से बचने के लिए न केवल मैं लॉकडाउन के नियमों का पूरी तरह पालन करूंगा, बल्कि औरों को भी आपकी तरह ही प्रेरित करूंगा। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आपने मेरी आंखें खोल दीं।

और दोनों मुस्कुरा दिये। रवि अपने घर लौट आया और दरवाजा बंद कर लिया।


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