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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

पैसा सब कुछ न बनाओ ....

वीरेन्द्र कौशल

जहानं का एक गज़ब असूल दुनियादारी में भी अज़ब भूल ज़ब तक ज़ेब में पैसा संसार सब अपनों जैसा ज़ब खाली हो जाये ज़ेब अपने ही देखो करते फ़रेब परिवार ही आँखे वो दिखाता अपना खून पराया हो जाता रिश्ते होते देखे तार तार कहां खो गया अपना प्यार मानवता यहां हैं बहुत रोती संस्कारी सांसे भी पड़ी सोती पैसा ही बन गया प्रधान नहीं दिखता समस्या का समाधान जाने कब सही अर्थ जगेगा आँख पर पड़ा पर्दा फटेगा पैसा प्रधान तो न बनाओ सोई आत्मा को तो ज़गाओ मानव को थोड़ा इंसान बनाओ समाज में कुछ सुधार लाओ इंसानियत को फिर से जगाओ पैसा सब कुछ न बनाओ पैसा सब कुछ न बनाओ


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