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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

मां

सुनील मिश्रा

ओ प्यारी "मां" तुम तो एक बार जन्मदात्री हो... और आजीवन ममतामयी वर्षाजल देती रही हो। तुम प्रकृति की तरफ़ मेरे जीवन में लीन हो जाती हो। हमारे जीवन की अतल गहराइयों में, डुबती जा रही.... सफ़ेद बर्फबारी की तरह सृष्टि में लीन। अपने उन कामों में जिसमें... मैं जीत सकूं। "मां" अपनी प्रतिपल नयी नियति बनाती गई। मेरी मामूलियत और सामर्थ्य,ऊर्जा को संकल्पों में बदलती गई। तू "मां"जब झुककर खड़ी हो जाती तो.... सारी दुनिया सुख के आंचल में... लिपटकर जी भरकर सो जाती। तुम्हें गुस्सा नहीं आता है... गुस्सा आने पर भी तुम बहुत भोली लगती हो...।


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