मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

नहीं चाहती सीता बनना

सपना परिहार

बिना किसी अपराध के दंड की अधिकारी बनी हर सुखद क्षण से रही वंचित त्यागना पड़ा हर वो संबंध, जो आवश्यक था जीवन के लिए !! नही चाहती मैं बनना सीता नही देना मुझे कोई अग्नि परीक्षा और,,, नही छोड़ना मुझे वो सारे अधिकार उस समाज के लिए जो केवल दोषारोपण करना जानता है और थोपता है अपने अहम के साथ बहुत सारे नियम कायदे!! मुझे भी चाहिए स्वयं की स्वतंत्रता, निर्णय लेने का अधिकार, बिना किसी भेदभाव के इस पुरूष प्रधान समाज में,,,!


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें