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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

मैं तो एक मजदूर हूँ

सच्चिदानन्द मौर्य

(१) चौराहे से आया मैं चुनकर, मालिक की आवाज सुनकर, शीश महलों का मैं बुनकर, मेरे नसीब में कहाँ आलीशान बंगले, बेशक़ बनाता जरूर हूँ। मैं तो एक मजदूर हूँ।। (२) मैं फावड़ा हूँ, मैं बेलचा हूँ, मैं हँसिया हूँ, मैं मिट्टी सीमेंट बालू का बोरा हूँ, मैं कैंची सिलाई मशीन मैं डोरा हूँ, मैं फटे कपड़े भी पहन लेता हूँ कोट पैंट से दूर हूँ। मैं तो एक मजदूर हूँ।। (३) मैं झाड़ू हूँ पोछा हूँ, मुलायम गद्दे दुखते हैं मैं जमीन पर सोता हूँ, मैं सड़कें बनाता हूँ, मैं भूख को भी मार के खाता हूं हाँ मैं इतना क्रूर हूँ। मैं तो एक मजदूर हूँ।। (४) रिक्शा मेरा साथी है, टेम्पो मेरा कार है, सर पे रखा बोझा मेरा श्रृंगार है, मैं आम अंगूर अमरूद अनार सेब सन्तरा लीची केला हूँ मैं आलू प्याज टमाटर गोभी धनिया मिर्च नींबू से भरा ठेला हूँ, मैं ठंड गर्मी वर्षा के रस से भरपूर हूँ। मैं तो एक मजदूर हूँ।। (५) नीचे हूँ ऊंचाईयों पर मगर चढ़ता हूँ, पीछे हूँ मगर आगे रोज दौड़ता हूँ, मेरे जठराग्नि से कीमती मेरी जान कहाँ, नंगा हो गटर में उतरता हूँ, सफाईवाले के नाम से मशहूर हूँ। मैं तो एक मजदूर हूँ।। (६) न जाना पड़े परदेस हमे हमारे गांव में जो कुछ काम हो जाए, मुझे कल की भी चिंता नहीं बस दो जून की रोटी का इंतजाम हो जाए, कुछ सोचिए कि हमारा भी कुछ भला हो, हमारे घर मे भी सुबह शाम दो बार चूल्हा जला हो, शौक नही साहेब, पर बाहर जाने को मजबूर हूँ। मैं तो एक मजदूर हूँ।।


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