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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

अपने चेहरे पर मुखौटा क्यों भला?

रवीन्द्र सिंह यादव

रेल-पटरी के ऊपर वर्षों पहले बने जर्जर ज़ंग लगे लोहे के पुल से गुज़रते हुए चिंतनीय सवाल मुनिया ने बापू से पूछा- "एक दिन यह पुल गिर जाएगा न जाने दिन का होगा कौन सा पहर चुपचाप अकेला गिरेगा या बरपाएगा गुज़रते लोगों पर क़हर? फिर किसी की लापरवाही तय करने के लिए आयोग बनेगा दोष तय करने का कब योग बनेगा?" बापू ने कहा- "ख़ाली दिमाग़ शैतान की दुकान! यह नहीं कोई विचार महान कुछ और सोचो तुम्हें बड़ा आदमी बनना है।" "बड़ा आदमी नहीं! संपूर्ण औरत! अपने चेहरे पर मुखौटा क्यों भला?" मुनिया चिहुँक पड़ी मुनिया की समझदारी पर बापू की आँखें फटीं रह गयीं।


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