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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

रोहिङा के फूल

रामदयाल रोहज

खिले फूल लाखों रोहिङा जैसे मरुधर की आँखें धधक रहे अंगारों से जलती तरुवर की शाखें भरे हुए मकरंद से पूरे फिर भी जलते जाते कान पकङ कर गर्मी को महीनों से पुन जगाते मरु तांडव कम करने को जप करता जीवन सारा टीले शिवलिंग पर हरदिन करता रहता जल धारा जिसे सजाकर बालों में हर्षित होती बन बाला बन जाती है गजब परी कंठों में पहन कर माला खिले फूल से गोल गाल यौवन छल छल करता है मुग्ध रवि निज कदमों को धीरे धीरे धरता है

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