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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

मृदुल कूक

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

तुम कूक उठी मृदुल-मृदुल ये गान तुम्हारा अमर रहे | प्रेमीजन सुन कूक तुम्हारी मगन रहे || तुम काली-काली रुप न देखा जग स्वर उतर जाये उर | जैसे प्रेमी की हूक अमर || स्वच्छ गगन तले घने पातों के बीच छिपे कंठ तुम्हारा अमृत बर्षाये | गा-गाकर अमर गान स्वयं ही हर्षाये || कोकिल प्यारी श्याम छवि न्यारी गूँज रही बागों में ध्वनि तुम्हारी | तुम गाओ नित-नित, हम सुनेंगे मृदुल कूक तुम्हारी ||


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