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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

माँ

कमलेश शर्मा "कवि कमल"

माँ शक्ति है,माँ भक्ति है, माँ ही प्राण,माँ ही पूजा। माँ के जैसा इस जग में,होगा कोई और न दूजा।। माँ दिन हे,माँ रात हे,माँ सुबह हे,माँ ही शाम है। माँ की गोद से बढ़कर मिलता किसे आराम है। माँ भूख,माँ प्यास है,माँ ही जीने की एक आस है। मूर्छित से जीवन में,माँ एक वायु की श्वास है ।। माँ शून्य है, माँ सृष्टि है,माँ ही नयन की एक दृष्टि है। बंजर सी भूमि पर जैसे, माँ ही प्यार की एक वृष्टि है।। माँ ही अणु, माँ परमाणु,माँ श्वेताणु, माँ बिम्बाणु। सबकी नसों में दौड़ रहा है, माँ का ही एक रक्ताणू ।। माँ ही भाषा,माँ ही ज्ञान है,माँ संस्कृति,माँ विज्ञान है। प्रथम गुरु की बात आते ही मन में आता माँ का संज्ञान है।। माँ ही शब्द है,माँ ही वर्ण है, माँ स्वर है,माँ ही व्यंजन। सप्त लोक में कही न मिलता माँ के हाथ बना व्यंजन।। माँ मूर्त है,माँ अमूर्त है,माँ धुप में एक छावं है। सारे तीरथ बसे इसमें,सारी जन्नत माँ के पावं है।। माँ मंदिर,माँ ही मूरत, माँ सूरत है,माँ ही दर्पण। श्रद्धा के फूल लेकर "कमल" करे माँ को अर्पण।।

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