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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

……बस वो थी

कमलेश शर्मा "कवि कमल"

बीता बचपन मेरा सारा,मिलन की रात बस वो थी। नज़ारे देखे कई सारे, बस मुलाकात एक वो थी। एक दिन ऐसा आया, मैं थोड़ा सा था घबराया।। मैं कान्हा बन गया उसका, राधिका जो मेरी थी। दुआएँ दे रहे थे सब,दुआ के साथ बस वो थी। गए थे साथ में हम सब,आये तो साथ में वो थी।। हर तरफ मौज मस्ती है,कहीं खुशियाँ कहीं गम हैं उसकीआँखों मेंआँसू थे,खुशी दिल में उसके थी। जो मिले हम तुम दोनों ,गूंज उठी थी शहनाई। अधूरे इस दिल के कोने की,कर दी तूने भरपाई।। विवाह की वेदी पर लिए,जो सात फेरे हमने। मैं तुम्हारा दिन बना और,तुम मेरी रात बन पाई।। अधर से कोई अधर,कभी न दूर हो पाए। मिला जो साथ इस जग में,साथ जन्मों तक जाए। भरे झोली तुम्हारी वो, पथिक प्रेम पथ पर हो बनकर के सुदामा जो, तुम्हारे द्वार पे आये।।

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