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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

वक्त की गाँठ

गीता घिलोरिया

कहते हैं कि कुछ रोज़ की बात है बस... ये कहते-कहते बच्चों को कल डाँट दिया इस दुनिया में ! अब जाओ उधर बैठ लो या इधर लेट जाओ ... ये बकते-बकते कितना आलस टांग दिया इस दुनिया में ! कहते हैं कि आज ये खा लो कल वो बना देंगे... ये रटते- रटते हमने तो महीना काट दिया इस दुनिया में ! अब के आँकड़े देखो तो दिल डूबने लगता है ... सोचते हैं वक्त की इस गाँठ को कैसे जीएं इस दुनिया में ! उफ़... कैसा विष बाँट दिया दुनिया में... हम सबको सब से काट दिया इस दुनिया में ! मानो या न मानो .... अब तक कितनो को छाँट दिया इस दुनिया में !


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