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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

लाल बसंत

गीता घिलोरिया

नाउम्मीदी अब अंगड़ाई ले रही है कभी मेरे भीतर तो कभी बाहर सो रही है ! होश में हूँ पर होशियार नहीं हूँ ये ज़िन्दगी महीनों से चीन को रो रही है ! तकिये पर औंधे पड़े पैर हिलते हैं पर दुनिया लगातार लाशें गिन रही है ! काफ़िर भी अब मन्नतें माँगते दिखे पर ज़रूरतों की सूची आधी हुए जा रही है ! बरसता पानी इस बसंत खौफ ले आया चली ठंडी हवा खबर बीमारी की बता रही हैं ! अब के लाल कर दिया इस बसंत को जिक्र इसका और फ़िक्र अपनों की कब से सता रही है ! कच्चे-पक्के रास्तों पर वीरानी फैली है पर शहर में हर सुबह रोज़ की सुर्ख़ हो रही है!


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