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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

मेरा रोना

डॉ० अनिल चड्डा

न जाने मुझे मेरा रोना क्यों पसंद आ गया क्यों मुझे इक-इक आँसू भा गया आँसुओं की हरेक बूँद में मेरे दर्द का अफसाना छिपा है मैं अपनी कहानी भूल न जाऊँ इसीलिये यह आँख से टपका है हरेक बूँद को पोंछते हुये यूँ लगता है बिछड़ रहा हूँ मैं खुद अपने से या मेरा कोई मुझसे बिछड़ा है


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